Saturday, October 16, 2010

अनुपयोगी हो गये माता पिता

अनुपयोगी हो गये माता पिता


यूज एंड थ्रो आधुनिक जीवन का मूलमंत्र बन गया है। क्या माता पिता अनुपयोगी हो सकते है? यहा बात काटने की नही जड से मिटाने की है।हमारी सभ्यता ने हमे सिखया था की जडो से दुर पेड नही पनपता,तो अपने उदगम से कटकर यह नदी कितने दिन प्रवाहमान रहेगी?आखिर इस सोच ने सिर कहा से उठाया होगा?

 कारण, जो बताये जाते है                                                      हालाकि,जीवन की भाग दौड़ का कारण, बहाना ज्यादा लगता है,लेकिन बहुत सी संताने इसे एक कारण मानती जरूर है। बदलती जीवन-शैली और बुजुर्गो का उनके साथ साम्य ना बैठा पाना, दुसरा कारण माना जाता है। चंद कारण बड़े व्यक्तिक और परिवार-दर-परिवार भिन्नता रखते है, पर इनके मूल मे धन और परिवार मे लोगो के अहमियत के मुद्दे होते है। अवहेलना के बहुत कम मामलो मे बड़े की सेहत या देखभाल न कर पाने की बात शामिल होती है।
एक बार समय को पलटे                                                             कारण जो भी हो, सोचने की बात यह है की आज जो संताने जो कर पा रही है, किसके बूते पर है? जब वे बच्चे थे, असहाय थे, तब माता-पिता ने उन्हे किसी आश्रम मे क्यो नही छोडा, इस बारे मे संतान को सोचने की जरूरत है, या उनके बच्चो को यह समझाये जाने की जरुरत हो जो उनके माता-पिता जो अपने अभिभावको के साथ कर रहे है, कभी उनके साथ भी कर सकते है।
सहारा न बन सकने वाले
यह वर्तमान समय का आधार वाक्य है। सहारे अकारण न मिलते है, न दिये जाते है। किये दिये का अहसान होता है और ना कर पाने का तर्क। निःस्वार्थ कुछ नही होता और न कर पाने के अफसोस का दंश भी जाता रहा है। आश्चर्य इस बात पर व्यक्त किया जा सकता है कि जो समाज अतिव्यस्त होने का दम भरता है, वह रिश्तो की नाप-तौल करने और किये दिये क हिसाब रखने मे जरा सी चूक कैसे नही करता? सहारा न बनने वाले समाज से यह सवाल तो पुछा ही जा सकता है।                                                                    नीव में दोष है                                                                                                                          आज के बच्चो को माता पिता अच्छी शिक्षा दिलाते है, उनके भविष्य के हर वो साधन उपल्ध कराते है,जिसके छाया मे वे सुनहरे कल के सपने बो सके। अभिभावक बच्चो को आत्मनिर्भर बनना सिखाते है, अपना काम खुद करने की सीख देते है। और वही बच्चे जब आत्मनिर्भर और अपना भला सोचने लायक परिपक्य मस्तिष्क के मालिक बनते है, तो वे सोचते है की अब उन्हे और की जरुरत ही क्यो पड़ेगी, जबकी वे अपना भला सोचने मे खुद सक्षम है। यही बात वे अपने घर के बुजुर्ग हो चले शरीरो के बारे मे भी लागू करते है।आज की पीढी को कदम कदम पर सलाह मशविरा करना पसंद नही, रोक-टोक पसंद नही,पबंदिया नगवार लगती है और जब घर के बुजुर्ग उन्हे अपने अनुभव के परिप्रेक्ष्य मे सलह देते है, तो उन्हे बुरी लगती है। जब बुजुर्ग अपना काम करने मे शारिरीक रुप से असक्षम होते है, तो नई पीढ़ी की बांदिशे उन्हे अपना काम खुद करने की की सलाह देते है। वे कर नही पाते तो बच्चो को करना पडता है।और इसी जिम्मेदारी से बचने के लिये वे वृध्दाश्रम का रास्ता खोज लेते है। पता खोजकर अपने बुजुर्ग हो चले माता-पिता के लिये कमरा देख लेते है। दरअसल, वे अकेलेपन का दंश क्या होता है वे नही जानते है। अपना भरा-पुरा और समृध्द-खुशहाल परिवार देखने की चाह मे जिस शरीर ने खुद को समय के साथ लड़ते हुए तपाया था, उसे वृध्दाश्रम की मृतपाय हो चुकी दिवारो के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यह दोष नई पीढ़ी का नही, पीढ़ी को मिल रही शिक्षा का और जड़ो से विमुख हो जाने वाली झूठी आत्मनिर्भता की सीख का है, जो रिश्तो का महत्व नही सिखाती।                                                                                                                                                                           क्यो इतनी कठोरता?                                                                    बुजुर्गो को वृध्दाश्रम भेजने की कठोरता से बचा जा सकता है, लेकिन उससे पहले उनके प्रति अपने मर चुके लगाव को फिर से जिन्दा करना होगा। रोटी, कपडा, मकान की चाह से इतर सोचना होगा, ताकि रिश्तो की अहमियत को समझा जा सके। जो बच्चे माता-पिता से विमुख हो रहे है वे समझे की कितनी भी उड़ान भर ले, सांस लेने, दम लेने को धरती पर आना ही होगा। जमीन से उखड़े, तो पंखे के आसरे रह जायेगें, जो केवल हवा मे ही साथ देते है, जीवन का आधार नही।अपने बचपन को उलट लें
जब बच्चे छोटे थे, तो मां-पापा उनकी जैसी देखभाल करते थे, आज वैसी देखभाल मां-पापा की करनी होगी, पर बडो वाले मान के साथ। बुज़ुर्ग वंशबेल के पुराने प्रतिनिधि है, इनसे कटना या इन्हे खुद से दुर करना खुद को मिटाने जैसा है‍।

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